Sunday, August 7, 2011

कुछ किताबें

कुछ किताबों के पन्नो ने भी सुना है मुझे
मुझे यकीन है
एक दिन ये किताबें जँरूर लोगों को बतायेगीं
लोग भोचक्के रहे जायेगें, जिस दिन ये किताबें रोएंगी
वो रोते हुए आँसु नही मेरे एह्सास को झल्काँएगी
कुछ कहें या ना कहें तुम से लेकिन मेरा ज़िक्र जरुर कर जायेगी
कुछ किताबें आज भी सुनती है मुझें
कुछ किताबें आज भी रोती है मेरे एह्सास को देखकर
कुछ किताबें आज भी सोती है मेरे साथ
कुछ किताबों से नींद खरीदी है मेनें
मैं ज़िन्दाँ हुँ
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Wednesday, July 20, 2011

ज़िन्दगी

"ज़िन्दगी कि दौड मे गिर गया हुँ मैं
चोट गहरी है
बहुत दर्द है अभी इस घाँव मे,

यु साँस चुरायी ज़िन्दगी ने
मानो कुछ था ही नही
इस शरीर मे बस धडकन है
कपकपाति हुइ

युँ चँद करीबी चिरांगो के बुझने से हुआ है अन्धेरा
ज़िन्दगी मे
खुद को रोश्न करने का वक्त-ए-यार लगता है"
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Monday, January 31, 2011

ऐसा ही है

ये जमाने कि फ़ितरत है
कभी हँसानें की
कभी रुलाने की
कभी उठाने कि
तो कभी गिराने कि
रख होसला इबादत कर
आदत पड जायेगी
तुझे भी
जनाजे से पहले
मुँसकुराने कि

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रंग ज़िन्दगी के

मायुस ना हो
ये जो तेरी ज़िन्दगी मे रंग है
ये असली है.. ये हल्के नही पडेंगे
अक्सर दीपावली पर रंग करवाते है घर मे
पर आज भी देखता हुँ, तो सोचता हुँ
इस ज़िन्दगी के दीपावली कब आयेगी
क्या कभी मेरे अरमान नये कपडे पहनेगे
आज भी समय कि फ़टी चादर औड लेता हुँ
मैं अक्सर
जिन्दगी के रंग ज्यादा अच्छे होते है
वो हल्के नही पड्ते
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अजीब है पर सच है

जब तक इन्सान ज़िन्दा रहता है
उससे पीछे खिचा जाता है और नीचे गिराया जाता है
और जब मर जाता है
तो उससे उपर उठाया जाता है और आगे बडाया जाता है
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