Wednesday, July 20, 2011

ज़िन्दगी

"ज़िन्दगी कि दौड मे गिर गया हुँ मैं
चोट गहरी है
बहुत दर्द है अभी इस घाँव मे,

यु साँस चुरायी ज़िन्दगी ने
मानो कुछ था ही नही
इस शरीर मे बस धडकन है
कपकपाति हुइ

युँ चँद करीबी चिरांगो के बुझने से हुआ है अन्धेरा
ज़िन्दगी मे
खुद को रोश्न करने का वक्त-ए-यार लगता है"
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Monday, January 31, 2011

ऐसा ही है

ये जमाने कि फ़ितरत है
कभी हँसानें की
कभी रुलाने की
कभी उठाने कि
तो कभी गिराने कि
रख होसला इबादत कर
आदत पड जायेगी
तुझे भी
जनाजे से पहले
मुँसकुराने कि

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रंग ज़िन्दगी के

मायुस ना हो
ये जो तेरी ज़िन्दगी मे रंग है
ये असली है.. ये हल्के नही पडेंगे
अक्सर दीपावली पर रंग करवाते है घर मे
पर आज भी देखता हुँ, तो सोचता हुँ
इस ज़िन्दगी के दीपावली कब आयेगी
क्या कभी मेरे अरमान नये कपडे पहनेगे
आज भी समय कि फ़टी चादर औड लेता हुँ
मैं अक्सर
जिन्दगी के रंग ज्यादा अच्छे होते है
वो हल्के नही पड्ते
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अजीब है पर सच है

जब तक इन्सान ज़िन्दा रहता है
उससे पीछे खिचा जाता है और नीचे गिराया जाता है
और जब मर जाता है
तो उससे उपर उठाया जाता है और आगे बडाया जाता है
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Sunday, October 3, 2010

मै खुद खुश नही

अरे मैं तो इन्सान हुँ
सब को खुश तो भगवान भी नही रख पाते
तो मुझसे ऐसी उमीद क्यो
अरे गम ना कर
कुछ बादल बगेर बरसे भी निकल जाते है
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Wednesday, September 22, 2010

अब खुदा को कहा रहना है ये भी इन्सान बतायेगा!!!

अब भला हम मुर्खो को और क्यो मुर्ख बनाते हो
बता क्यो नही देते कि
मंदिर मे नही मस्जिद मे नही
कही और तशरीफ़ लाते हो
इबादत के नाम पर अब
लोग तुम्हे भुनाने लगे है
पता नही , ना जाने क्यो
लोग तुम्हे मन्दिर और मस्जिद मे चुनवाने लगे है
है कोइ हुकुम या फ़रिश्ता आयेगा
वाह! क्या समय आगया है
अब खुदा को कहा रहना है
ये भी इन्सान बतायेगा!!!
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Monday, September 6, 2010

मेरे सपने सांस लेने लगे है

अब सोई हुई रातों मे मुझे नींद नही आती
मेरे सपने सांस लेने लगे है
आज फ़िर लगता है ज़िन्दा हुँ मैं
मेरे सपने सांस लेने लगे है
अब मुन्तज़िर नही मैं सुबह होने का
मेरे सपने सांस लेने लगे है
अब फ़लाकत भी सर झुकाने लगी है
मेरे सपने सांस लेने लगे है
अब होंसलों से उडान भरनी है मुझको
मेरे सपने सांस लेने लगे है
अब सोई हुई रातों मे मुझे नींद नही आती
मेरे सपने सांस लेने लगे है
अब सोई हुई रातों मे मुझे.............
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