Friday, September 9, 2016

बदमाश गलियों में

बदमाश गलियों में
आवारा घूमती ज़िन्दगी
कभी सुबह तो कभी शाम
कुछ कुछ ढूढ़ती रहती है
बहुत वक़्त हो गया
शाम में घर को लौटे
लेकिन मज़ेदार बहुत है
कुछ ना कुछ मिल जाता है
हर रोज़ राह में चलते चलते
खुद को ज़िंदा रखने के लिए
बदमाश गलियों में
आवारा घूमती ज़िन्दगी

© Copyright  rajnishsongara

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